योग

अभ्यास योग के द्वारा भगवान में मन लगाना क्या है। इसके लिए दो योग्यताएं होनी चाहिए:

  1. ईश्वर प्राप्ति की उत्कट इच्छा अर्थात् ऐसी इच्छा कि चाहे कुछ भी हो जाए मुझे भगवान की हर हालत में प्राप्ति होनी ही चाहिए।

2 ऐसी कोशिश कि किसी तरह से भगवान में मन लग जाए। इसके लिए निम्न में से किसी एक साधन के द्वारा भगवान में मन लगाने का अभ्यास करना। इसके दो तरीके हैं (उदाहरण द्वारा समझने के लिए इस पुस्तक में लिखी गई अछूत देवी नामक कथा पढ़िए) :

(i) सगुण साकार

(ii) निर्गुण निराकार

(i) सगुण साकार मूर्ति, कोई मानसिक आकार अर्थात् आप मन में भगवान का कोई भी आकार बना लें या कोई तस्वीर जो आपको मिल जाए, और कुछ नहीं तो मिट्टी की मूर्ति अपने आप बना लें और उसको ईश्वर मान लें। यह मान लो ईश्वर कहाँ नहीं है. जो सभी जगह और हर वस्तु में मिल जायेंगे यदि आपकी जबरदस्त इच्छा है तो यो सभी जगह आपको मिल जायेंगे।

(ii) निराकार ब्रह्म की उपासना अर्थात् प्रेमपूर्वक भगवान के नाम का जप, बार-बार नाम का उच्चारण, मानसिक जाए सांस के साथ-साथ जब प्रभु के किसी भी नाम का किसी भी भाषा में उनको बार-बार पुकारना (Name repeation of Supreme power)

(iii) ओ३म् का उच्चारण या भंवरे की तरह इसका गुलजार कर अभ्यास करना।
(iv) स्वाभाविक श्वास-प्रश्वास के साथ-साथ भगवान के नाम का नित्य-निरन्तर जप करना। जैसे सीस अन्दर ली तो राम-राम, सींस छोड़ी तो राम-राम इस प्रकार किसी एक स्थान पर गर्दन और कमर को सीधी करके किसी दीवार के सहारे या कुर्सी पर बैठकर आँखें बंद करके एकान्त स्थान पर ईश्वर की लगातार उपासना करना। आप अगर किसी और धर्म को मानने वाले हैं तो आपके धर्मानुसार भगवान के नाम का सास के साथ-साथ बार-बार जप करना।

(v) प्राणायाम द्वारा अभ्यास करना

इनमें से किसी भी एक उपाय के द्वारा किसी प्रकार सगुण साकार या निर्गुण निराकार किसी भी प्रकार भगवान की निरन्तर पूजा। असल उपाय यह कि भगवान को पाने की जबरदस्त इच्छा के साथ अपने आपको उनकी शरण में ही समझकर उनको याद करना।

हो सकता है फल प्राप्ति में हो जाए किन्तु आपको ऊब कर या आलस्य और प्रमादवश अपना साधन छोड़ना नहीं चाहिए। चलते-फिरते, कोई काम करते वक्त भगवान में मन लगाए

मुझे अपने अध्यापक के कहे हुए शब्द याद आते : “Knock-knock, the door will be opened ” इन सभी उपायों को हम अभ्यास-योग कहेंगे।
अपने पुनर्जन्म वाले परिवार से इस प्रकार तिरस्कृत किए जाने से रामू का मन क्षोभ से भर गया। अत्यन्त उत्साह से वो अपने पूर्व जन्म के परिवार से मिलने आया था और वो धन जिसके पाने के बाद उसके पूरे परिवार ने मुँह फेर लिया, रामू के दुख से उपजे क्रोध के कारण उसकी शिराओं में रक्त का प्रवाह तीव्र हो गया। उसका मन हुआ कि इस चलती ट्रेन में से कूद कर अपनी जीवन-लीला समाप्त कर ले। फिर उसे उसको दीक्षा देने वाले महात्मा के शब्द याद आये कि सिद्धि का अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए न करना। गीता ज्ञान के शब्द भी याद आए कि मनुष्य जीवन अत्यन्त मूल्यवान है क्योंकि इसी जीवन में मनुष्य अपने जीवन व्यतीत करके कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग द्वारा अपने जीवन को उन्नत बनाने का प्रयत्न करे। इन विचारों से उसका मन थोड़ा बदला।

ट्रेन में समय बिताने के लिए रामू ने अपने सहयात्री से अखबार पढ़ने के लिए लिया। उस अखबार कई दिनों से शंकराचार्य द्वारा लिखित नामक लेख की श्रृंखला छापी जा रही थी उसमें छपे लेखमाला का उस दिन का शीर्षक था की क्षमता घटने पर सभी उसे छोड़ देते हैं। शीर्षक ने रामू का ध्यान अपनी ओर खींचा और उसने पढ़ना शुरू किया।

शंकराचार्य ने लिखा कि तक तुम्हारे अन्दर धन कमाने और बचाने की शक्ति है तभी तक तुम्हारे आश्रित तुमसे चिपके रहेंगे पीछे जब तुम बूढ़े हो जाओगे और शरीर निर्बल हो जाएगा तब तुम्हारे घर का कोई भी व्यक्ति तुमसे बात भी नहीं करेगा। (गोविन्द को गोविन्द को भजो)
लेख के व्याख्याकार स्वामी चिन्मयानंद ने लिखा है कि जीव के रूप में मनुष्य मूलतः स्वार्थी होता है। साधारणतया वह कुछ नहीं देगा जब तक कुछ पाने की आशा न हो। नहीं के लिए कुछ नहीं यह नियम प्रायः प्रकृति पर भी लागू है। यह नियम सर्वव्यापी है इसलिए सामान्यतः प्रिय एवं निकट सम्बन्धी भी परिवार में कमाने और बचाने वाले सदस्य की अधिक खातिर करते संबंधियों के हर स्तर पर चाहे वह पुरुष और स्त्री हो, पिता और पुत्र हो या भाई और बहन हो – यह देखा गया है। संक्षेप में मनुष्यों के हर तरह के संबंधों केवल कमाने और बचाने वाले का, वे सभी व्यक्ति आदर करते हैं, जो उनकी बचत से कुछ लाभ की आशा रखते हैं। यह बहुत ही लोकप्रिय कहावत है कि पैसा ही प्रतिष्ठा है और पैसे से हर चीज खरीदी जा सकती है। मनुष्य का जीवन चाहे जैसा भी हो, क्षमता और शक्ति को तो समाप्त होना ही है क्योंकि वृद्धावस्था शारीरिक और मानसिक सामर्थ्य को अवश्य क्षीण करेगी।

इस मूल सिद्धान्त को ध्यान में रखते हुए भगवान शंकराचार्य का कहना है कि कोई भी मनुष्य तभी तक दूसरों को प्रिय हो सकता है जब तक उसमें कमाने और बचाने की शक्ति बची है। तभी तक दूसरे लोग उसके धन से लाभ उठा सकते हैं। जब मनुष्य की क्षमताएं घट जाती है, उसका शरीर वृद्ध और निर्बल हो जाता है, तब उसके सभी मित्र और आश्रित उसे छोड़ देते हैं क्योंकि उससे उनका मतलब नहीं निकलता। संसार की यही रीत है।
पहले से ही चेत जाने का अर्थ है, आने वाले समय की तैयारी पहले ही कर लेना। सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने वाले मनुष्यों की स्वाभाविक प्रवृत्ति जानते हुए एक बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह जितना हो सके अर्जन करे, अपनी शक्ति के अनुसार दूसरों को दे और यथासंभव दूसरों का स्नेह सहयोग और आदर प्राप्त करे
परन्तु वह उसे जीवन का लक्ष्य न बनाए। वह आंतरिक शक्ति और आत्मपूर्णता भी प्राप्त करे तथा उसकी रक्षा उन सभी खुशामदी टट्टुओं से करे जो उसके चारों ओर
फैले है और और उसके अहंभाव को बढ़ाने की सर्वदा चेष्टा करते हैं ।

अखबार की इस प्रति को रामू ने अपने सहयात्री से आग्रह करके ले लिया। अपने घर की ओर वापिस लौटते समय रामू को अजमेर जंक्शन से ट्रेन बदलने लिए कुछ समय रूकना पड़ा। समय गुजारने के लिए उसने किसी एकान्त स्थान की तलाश की जो उसे आनासागर की बारादरी के किनारे, खामखा के तीन दरवाजे नामक स्थान पर मिली। पहले उसने बजरंगगढ़ पहुँच कर त्रेता-युग में प्रकट हुए श्री नारायण अवतार, श्री राम के अनन्य भक्त और सेवक, बजरंगबली के मन्दिर पर शीश झुकाया उसके उपरान्त आनासागर की बारादरी आ पहुंचा।

यहाँ बैठ कर उसने अखबार को फिर से देखा, लेख के महत्वपूर्ण दर्शन को फिर से पढ़ा। ” इस श्लोक में एक चिंतक को मिथ्याभिमान के विरुद्ध प्रतिपक्ष भावना का आधार प्राप्त होता है। इस पर मनन करके, अपने मन को मिथ्यामूल्यांकन और सुरक्षा की भ्रामक भावनाओं से विमुख करना है और सर्वोच्य ब्रह्म की उपासना में लगाना है। यह अभी और ‘यहाँ किया जा सकता है, युवावस्था में मनुष्य की दक्षता और मानसिक क्षमता जब पूर्णावस्था में रहती है तभी इसका अभ्यास करना चाहिए।”
निःसंदेह हर युवक जीवन में सफलता की खोज करे वह कडी मेहनत करे बाधाओं से जूझे और खतरे का मुकाबला करे हर व्यक्ति धन अर्जित करे बचाए और
दूसरों को यथासंभव देकर अपने समाज और देश की अधिकाधिक सेवा करे परन्तु इसे केवल मन बहलाव का काम मानना चाहिए। जीवन का मुख्य कर्तव्य होना चाहिए आत्मशुद्धि की प्राप्ति और ब्रह्म की उपासना सच्ची प्राप्ति तो अपने वैयक्तिक एवं आंतरिक चिंतन में है, कि अंत में संस्था द्वारा परित्यक्त होने के पूर्व हम स्वयं ही संसारी क्रियाकलापों से अवकाश प्राप्त कर इससे भी स्मृद्धिशाली संसार में प्रवेश करें जहां शांतिपूर्ण चिंतन किया जा सके और आत्म शुद्धि की प्राप्ति हो सके।

Rebirth (part -3)

Continued from part 2..

अब लौटते हैं अपनी पुनर्जन्म की कथा की ओर –

लखमीचन्द्र उर्फ लक्खू जो पुनर्जन्म में रामू बनकर पैदा हुआ अपने पूर्व जन्म का रहस्य जानकर उसने क्या किया। अपने मन में यह कामना लेकर वह कलकत्ता रवाना हुआ कि अपने पूर्व जन्म के परिवार को पाकर वह सब कुछ बताएगा और निश्चित रूप से उसके पुत्र और पत्नी उसको पाकर खुश होंगे और उसके कमाये हुए धन का कुछ हिस्सा पाकर उसके कष्ट के दिन खुशी के रूप में बदल जायेंगे।

लखमीचन्द्र जो कि अब रामू बन चुका था, ने कलकत्ता पहुँच कर ढूंढा और दरवाजा खटखटाया। उस समय रात के लगभग नौ बजे का समय रहा होगा। दरवाजे पर दस्तक की आवाज सुन कर लखमी चन्द्र के बड़े पुत्र ने दरवाजा खोला। रामू बने लखमीचन्द्र ने अपने बड़े पुत्र को उसके नाम से सम्बोधित किया तो वह अचम्भित रह गया। उसने प्रत्युत्तर में पूछा कि आप कौन? रामू ने कोई उत्तर नहीं दिया और छोटे पुत्र का नाम लेकर उसके बारे में पूछा। बड़े पुत्र ने छोटे भाई को आवाज देकर बुलाया, इतनी देर में वह भी आ गया रामू ने उसे स्नेह भरी नजर से देखा, अब रामू ने अपनी पूर्व जन्म की पत्नी का नाम लेकर पूछा कि वे कहाँ हैं। लखमीचन्द्र के बड़े पुत्र ने अचम्भित होकर पूछा कि आप कौन हैं और मेरी माताजी को कैसे जानते हैं। वार्तालाप की आवाज सुनकर लखमीचन्द्र की पत्नी भी उपस्थित हो गई। उसे देखकर रामू को कई गुजरे पल याद आने लगे। वो खामोश नीची निगाहें करके उदास मन से थोड़ी देर शान्त बैठा रहा। लखमीचन्द्र के परिवार के सभी सदस्य आगन्तुक को विस्मय से देख रहे थे क्योंकि अभी रामू ने अपने पूर्व जन्म का परिचय नहीं दिया था। अब रामू बने लखमीचन्द्र ने अपने बड़े पुत्र से दुकान के बारे में जानकारी चाही, जिन व्यापारियों से उसका सदा सम्पर्क रहा उनके बारे में जानकारी चाही। अब उसके पुत्र का धैर्य जाता रहा और वह नाराजगी भरे लहजे में लखमीचन्द्र से पुनर्जन्म में रामू बने लड़के से पूछा कि आप कौन हैं हमारे घर परिवार और धंधे के बारे में इतनी जानकारी कैसे रखते हैं आखिर रामू को इस रहस्य को उजागर करना ही पड़ा कि “मैं ही पिछले जन्म में तुम्हारा पिता लखमीचन्द्र था”, इस रहस्योद्घाटन से सारा परिवार चकित रह गया। रामू ने कहा कि आप थोड़ी देर के लिए अपनी माता जी से मुझे एकांत में बात करने दीजिए। सत्य जानने के लिए लखमीचन्द्र की पत्नी ने सहमति प्रदान कर दी। बातचीत के दौरान कुछ बातें अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में बताई जो बिल्कुल सत्य थीं। अब लखमीचन्द्र के पूरे परिवार को रामू की बात पर पूरा विश्वास हो गया था कि पिछले जन्म में अपनी गरीबी को दूर करने के लिए जिस लगन से मेहनत की उसी कारण वो सफल हो पाया। पर धन संग्रह करने के लोभ के कारण कई मजबूर ग्राहकों का उसने गलत फायदा उठाया और लोभवश कई मजबूर मनुष्यों का धन उसने हड़प लिया था, इसी कारण वो मरकर इस जन्म में पिछले जन्म से भी ज्यादा गरीबी और दुख इस जीवन में भोग रहा है। सारा हाल जानकर उसकी पिछले जन्म की पत्नी को गहरी सहानुभूति हो गई। उसके पुत्रों का व्यवहार भी उसके प्रति थोड़ा नरम हो गया। लेकिन उसके पुत्र ने प्रश्न किया कि जिस अथाह धन की बात रामू कर रहा था वो तो उसे कहीं नहीं मिला। हाँ इतना अवश्य है कि जो धन वो छोड़ गए उससे आराम की जिन्दगी कट रही है रामू ने कहना शुरू किया जब जिन्दगी में मनुष्य को अपने कर्मों के कारण दुख भोगना पड़ता है तभी उसके मन में पश्चाताप की भावना प्रबल होती है। सेनेटोरियम में मरणासन्न स्थिति में जो गीता ज्ञान सुना उसी के कारण उसको पश्चाताप हुआ था लेकिन इससे पहले कि मैं अपनी भूल सुधारता, मृत्यु ने मेरी जीवनलीला समाप्त कर दी। बातचीत में काफी रात बीत चुकी थी किन्तु सबकी आँखों से नींद कोसों दूर थी। थोड़ी देर बाद रामू ने बड़े पुत्र को कहा कि स्टोर रूम में गेती-फावड़ा रखा है, उसे ले आओ। उसने अपने बड़े पुत्र को घर में एक स्थान को चिन्हित करते हुए खोदने के लिए कहा। तीनों जनों ने मिलकर प्रयास किया और वो लोहे का बक्सा खोद कर निकाला जो उसने पिछले जन्म में छुपाया था। बक्सा खोलने पर उसके पूरे परिवार की आँखें आश्चर्य से फटी रह गई। अचानक इतनी धन-सम्पत्ति जो कि सोने के गहने और मूल्यवान हीरे-जवाहरात के रूप में थी, देख पूरे परिवार के मन में लोभ आ गया। लोभ ऐसा अवगुण है जो सारे रिश्ते-नातों को खत्म कर देता है। रामू ने कहना जारी रखा कि इसी धन के कारण उसे पिछले जन्म और इस जन्म में भी उन संचित कर्मों को भोगना पड़ रहा है जो अब प्रारब्ध बन उसके सामने आ रहे हैं। हो सके तो वो उन मजबूरों को लौटा दे। सभी के नाम पुरानी बही में दर्ज हैं।

रामू ने कहना जारी रखा कि वह बहुत-सा धन छोड़कर गया था हो सके तो मुझे थोड़ा सा दे दें, ताकि मेरा वर्तमान जीवन अत्यधिक कष्टों से बच जाए। लखमीचन्द्र के पुत्र ने कहा कि अभी सब विश्राम करें, सुबह इस बारे में विचार किया जाएगा।
सुबह जल्दी उठ कर लखमीचन्द्र का बड़ा पुत्र रामू के लिए टिकट ले आया। टिकट और राह-खर्च देकर रामू से कहा कि अब आप यहाँ से पधारें। मेरे पिता लखमीचन्द्र अब इस दुनिया में नहीं हैं, आपने अगर पिछले जन्म में कुछ पाप करके रुपया कमाया होगा तो उसके बारे में आप भुगतें, हमें इससे कोई सरोकार नहीं है। लखमीचन्द्र के वारिस के नाते यह सारा धन हमारा है यहाँ पधारने के लिए शुक्रिया। खरी-खरी सुनाने के उपरान्त लखमीचन्द्र के पुत्र ने रामू को विदा करके घर का दरवाजा बन्द कर दिया।

(कथा से यह ज्ञान हो जाना चाहिए कि जिन अपनों के लिए आप पाय करके धन कमाते हैं उसका फल आपको अकेले भोगना पड़ेगा)

पाठको धन वह पदार्थ है जिसके लिए लोग सारे रिश्ते-नाते भूल जाते है और वर्तमान जीवन को ही सब कुछ मानकर कामनाओं के कारण लोग बड़े से बड़ा अपराध करने से नहीं चूकते। तो यह मामला फिर पिछले जन्म का था। कर्म करने से पहले मनुष्य को यह जरूर सोचना चाहिए कि ईश्वर के बनाये कर्मविधान से मनुष्य बंधा हुआ है। इस कर्म बंधन से भगवान कृष्ण द्वारा उपदेश किया समय कर्मयोग ही छुड़ा स्कता है। अर्थात् ईश्वर को समर्पित शुभ कर्म जो बिना फल की आशा के किए जाये. यहीं समत्व कर्मयोग है।

कर्मयोग के सम्बन्धित गीता के कुछ श्लोक जो इस प्रसंग में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सम्बोधित करते हुए कहे :

अध्याय 2 श्लोक संख्या 40

इस कर्मयोग में आरम्भ का अर्थात बीज का नाश नहीं है और उलटा फलरूप दोष भी नहीं है, बल्कि इस कर्मयोग रूप धर्म का थोड़ा सा भी साधन जन्म-मृत्यु रूप महान भय से रक्षा कर लेता है। ।40 ।।

व्याख्या: उदाहरणार्थ जैसे खेती करने वाला बीज जमीन में डालकर उसको सींचना छोड़ दे तो वह नष्ट हो जाता है। उसी प्रकार कर्मयोग के आरम्भ का नाश नहीं होता, इसके संस्कार साधक के अंतःकरण में स्थित हो जाते हैं और वे साधक को दूसरे जन्म में जबरदस्ती पुनः साधन में लगा देते है। इसका विनाश नहीं होता। जहाँ कामनायुक्त कर्म होता है वहीं अच्छे-बुरे फल की सम्भावना रहती है, जहाँ कामना का सर्वथा अभाव है उसमें विपरीत फल नहीं होता, जैसे रोग नाश के लिए ली गई दवा के दुष्प्रभाव के जरिये रोग को बढ़ाने वाली भी हो सकती है, उस प्रकार कर्मयोग के साधन का विपरीत परिणाम नहीं होता।
पूर्वजन्म के पाप के कारण विषयभोग का एवं प्रमादी, विषयी और नास्तिक पुरुषों का संग होने से साधन में विघ्न बाधा-रुकावट तो आ सकती है, किन्तु निष्काम कर्म का परिणाम बुरा नहीं होता।

कर्मयोग किसको कहते हैं : शास्त्र अनुसार उत्तम कर्म का नाम कर्म है और समभाव का नाम योग है। फल की इच्छा त्याग कर, ईश्वर समर्पित कर्तव्य कर्म करना ही कर्मयोग है। समभाव से किए हुए युद्ध (सैनिकों के लिए धर्म-युक्त कर्म), कृषि, व्यापार, सेवा आदि छोटे-से-छोटा जीविका के कर्म भी भावपूर्ण होने पर क्षणमात्र में संसार से उद्धार करने वाला बन जाते हैं; क्योंकि कल्याण साधन में कर्म की अपेक्षा भाव की ही प्रधानताहै।
महान भय किसे कहते हैं : जियो को सबसे अधिक भय मृत्यु से होता है।

अनन्तकाल तक बार-बार जन्मते और मरते रहना ही महान भय है। इस जन्म-मृत्यु रूप महान भय को भगवान ने मृत्यु रूप संसार सागर के नाम से कहा है। (गीता अध्याय 12 श्लोक ) जैसे समुद्र में अनन्त लहरे होती हैं उसी प्रकार इस संसार समुद्र में भी जन्म-मृत्यु की अनन्त लहरें उठती और शांत होती रहती है। समुद्र की लहरे तो चाहे गिन भी ली जा सकती हो, पर जब तक परमात्मा के तत्त्व का यथार्थ ज्ञान ही होता तब तक कितनी बार मरना पड़ेगा इसकी गणना कोई भी नहीं कर सकता। ऐसे इस मृत्यु रूप संसार समुद्र से पार कर देना – सदा के लिए जन्म-मृत्यु से छुड़ाकर इस प्रपंच से सर्वथा अतीत सच्चिदानन्दं ब्रह्म से मिला देना ही महान भय से रक्षा करना है।

तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फल में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मा के फल का हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो।

(भगवतगीता श्लोक 2/47) भगवत गीता के अध्याय छः श्लोक 3 में अर्जुन द्वारा पूछे गए प्रश्न के उत्तर में जिस अभ्यास और वैराग्य का वर्णन किया गया और उसका संदर्भ कई बार आने के कारण उसको बार-बार उल्लेख किया जाएगा अभी पिछले श्लोक में संसार सागर से पार उतरने के बारे अध्याय 12 श्लोक 7 का वर्णन आया है. इस सम्बन्ध में अध्याय 12 के श्लोक संख्या 0 से 9 तक का वर्णन किया जा रहा है।
अध्याय 12 श्लोक संख्या 6

जो मेरे परायण रहने वाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मों को मुझ में अर्पण करके मुझ रावण रूप परमेश्वर को ही अनन्य भक्ति योग से निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं। ।6।।

व्याख्या भगवान पर निर्भर होकर, निर्भय और निर्विकार रहकर उनके भेजे हुए सभी दुःखो को झेलते हुए परमात्मा को अपना परम प्रिय और सब प्रकार से शरण लेने योग्य समझ कर अपने आपको उन्हें समर्पित कर देना ही उनके परायण होना है। कर्मों के करने में अपने आपको पराधीन समझ कर उनके संकेत के अनुसार कठपुतली की भाँति समस्त कर्म करते रहना; उन कर्मों में न तो ममता और आसक्ति रखना और न उनके फल से किसी प्रकार का सम्बन्ध रखना और सदा यह भाव रखना कि परमात्मा मुझसे जो कर्म करवा रहे हैं मैं कर रहा है, अत्यन्त श्रद्धा के साथ भगवान का चिन्तन करते ए उनकी उपासना करना, उनके नामों का उच्चारण और लीला का श्रवण और नाम-स्मरण करना ही भक्ति योग के द्वारा चिन्तन करते हुए उनकी उपासना करना है। अध्याय 12 श्लोक संख्या 7

है अर्जुन! उन मुझ में चित्त लगाने वाले प्रेमी भक्तों का में शीघ्र ही मृत्युरूप संसार समुद्र से अन्हार करने वाला होता हूँ।7।।

व्याख्या: जो जीव मन-बुद्धि को भगवान में सदैव लगाए रख कर निरन्तर उनकी उपासना में लगे रहते है, उन भक्तों को भगवान तत्काल ही जन्म-मृत्यु से सदा के लिए छोड़कर यहीं अपनी प्राप्ति करा देते है अथवा मरने के बाद अपने परमधाम में ले जाते हैं। यही भगवान का अपने उपर्युक्त भक्त को मृत्यु रूप संसार से पार कर देना है। अध्याय 12 श्लोक संख्या 8

मुझ में मन को लगा और मुझ में ही बुद्धि को लगा इसके उपरान्त तू मुझ में निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।18।।

जो सम्पूर्ण चराचर संसार को व्याप्त करके सबके हृदय में स्थित है और जो दयालुता, सर्वज्ञता, सुशीलता तथा सुहृदयता आदि अनन्त गुणों के सागर हैं – उन परम दिव्य, प्रेममय और आनन्दमय, सर्वशक्तिमान सर्वोत्तम, शरण लेने के योग्य परमेश्वर के गुण, प्रभाव और लीला के तत्त्व तथा रहस्य को भलीभांति समझ कर उनका सदा सर्वदा अटल निश्चय रखना – यही बुद्धि को भगवान में लगाना है। तथा इस प्रकार अपने परम प्रेमास्पद पुरुषोत्तम भगवान के अतिरिक्त अन्य समस्त विषयों से आसक्ति को सर्वथा हटाकर मन को केवल उन्हीं में तन्मय कर देना और नित्य-निरन्तर उपर्युक्त प्रकार से उनका चिन्तन करते रहना – यही मन को भगवान में लगाना है। इस प्रकार जो अपने मन बुद्धि को भगवान में लगा देता है, वह शीघ्र ही भगवान को प्राप्त हो जाता है।

भगवान में मन-बुद्धि लगाने पर यदि मनुष्य को निश्चय भगवान की प्राप्ति हो जाती है तो सभी ऐसा क्यों नहीं करते?

परमात्मा के गुण, प्रभाव और लीला के तत्व और रहस्य को न जानने के कारण भगवान में श्रद्धा प्रेम नहीं होता और अज्ञान जनित आसक्ति के कारण सांसारिक विषयों का चिन्तन होता रहता है संसार में अधिकांश लोगों की यही स्थिति है, इसी से सब लोग भगवान में मन-बुद्धि नहीं लगाते।

जिन लोगों की सांसारिक भोग-विलास में डूबे रहने और उनका ही निरन्तर चिन्तन की बुरी आदत है इसलिए वो भगवान के महान गुणों, उनका प्रभाव लीला तत्त्व के रहस्य को नहीं जानते हैं किन्तु बुरे चिन्तन और भोग विलास और स्वार्थबुद्धि और येन-केन-प्रकारेण धन के संग्रह और काम को ही परम प्राप्त वस्तु मान कर भगवान की ओर ध्यान न देना, भोग, आलस्य और प्रमाद के कारण परमात्म-प्रेम का मार्ग न समझना ही इसका मूल कारण है।

सम्बन्ध यहाँ यह जिज्ञासा हो सकती है कि यदि मैं उपर्युक्त प्रकार से भगवान में मन-बुद्धि न लगा सके तो मुझे क्या करना चाहिए। श्लोक संख्या 9 अध्याय 12 (अति महत्वपूर्ण )

यदि तू मन को मुझ में अचल, स्थापन करने के लिए समर्थ नहीं है तो है अर्जुन! अभ्यास रूप योग के द्वारा मुझको प्राप्त होने के लिए इच्छा कर। 19।।

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को निमित्त बनाकर सारे संसार के मनुष्यों के लिए उपदेश कर रहे हैं क्योंकि इस संसार में सभी की प्रकृति एक सी नहीं है। अतः सभी साधक भगवान की प्राप्ति करने के लिए अलग अलग साधनों को उचित मानते हैं। यहाँ पिछले श्लोक के अनुसार भगवान कह रहे हैं कि अर्जुन तू मुझमें मन और बुद्धि को अचल स्थापन करने में समर्थ नहीं है तो अभ्यास योग के द्वारा मेरी प्राप्ति की इच्छा कर।

The above extract is from the book “काम और राम” written by “Devraj Pathania”

Rebirth ( part -2 )

  1. पुनर्जन्म को जानने की सिद्धि

एक योग सिद्धि होती है जिसे कहते

संस्कारसाक्षात्करणातू पूर्वजातिज्ञानम। शब्दार्थ – संस्कृत-साक्षात-करणात = संस्कार साक्षात् करने से ;पूर्वजातीज्ञानम् = पूर्वजन्म का ज्ञान होता है।

अन्वयार्थ – संस्कार को साक्षात् करने से पूर्वजन्म का ज्ञान होता है।

उन संतों में एक संत सिद्ध योगी थे जो इस सिद्धि के जानकार थे। उसे संत ने कृपा करके रामू को इस सिद्धि की दीक्षा प्रदान की और बचन ले लिया कि रामू इस

सिद्धि का अनुचित लाभ नहीं उठायेगा।

संत अपने अगले पड़ाव की ओर चले गए और रामू ने दीक्षा के मुताबिक साधना आरम्भ की और एक निश्चित काल के उपरान्त रामू की साधना सफल हुई। उसने जो कुछ जाना यो निम्न प्रकार से है

पिछले जन्म में वो इसी मारवाड़ इलाके के एक कस्बे का रहने वाला था। तब भी वह एक गरीब खानदान से था, नाम था लखमी चंद। साधारण बोलचाल में उसे सभी लक्खू के नाम से बुलाते थे। मारवाड़ राजस्थान, के कई व्यापारी कलका राहर में कपड़ा मार्केट में नामी सेठ बन गए थे लक्खू तो अत्यन्त गरीब था लकिन फिर भी वो कपड़ा मार्केट के मारवाड़ी समुदाय में जल सेवा का कार्य करने लगा इस कारण वो मारवाड़ी व्यापारियों में काफी लोकप्रिय था। लक्खू अपने घर से पानी पिलाने वाला एक बर्तन झारी अपने साथ लाया था। कपड़ा मार्केट में उसने निश्चित स्थान पर दो घड़े रख रखे थे। रोज सुबह वो इन दोनों घरों को अच्छी तरह से साफ करके इनमें शुद्ध जल भर लेता था और उन मटकों को टाट की बोरी से लपेट देता था और समय-समय पर इनको जल से गीला करके रखता था इसलिए मटकों का पानी हमेशा ठण्डा बना रहता था। नियमित तौर पर लक्खू सारे बाजार में घूम-घूमकर सबको ठण्डा पानी पिलाता था। इस कारण लक्खा सबका प्रिय बन गया। लक्खू रोज उस ठण्डे पानी में केवड़े का अर्क डाल देता था। इससे पानी ठण्डा होने के साथ केवडे की खुशबू लिए रहता। तो जो भी पीता, तृप्त हो जाता। कलकत्ते के पसीने वाली गर्मी में यह पानी अमृत समान लगने लगा। लक्खू सबका प्रिय था अतः मार्केट वाले सारे व्यापारी खुश होकर लक्खू को कुछ न कुछ धन जरूर दिया करते थे। अब लक्खू का जीवन आराम से कटने लगा। दानी मार्केट व्यापारियों के धन से धीरे-धीरे लक्खू की आर्थिक स्थिति बेहतर हो गई। मार्केट में कपड़े की गाँठों का काफी व्यापार होता था कुछ जमा पूँजी जो लक्खू के पास जमा हो गई थी। लक्खू ने जुगाड़ लगाकर एक व्यापारी से कपड़े की एक गाँठ खरीदी और उसे उसी व्यापारी के पास जमा कर दी। दैवयोग से कपड़ा बाजार में एकदम से तेजी आ गई, अत लक्खू को कपड़े की गाँठ से दुगुना फायदा हो गया। अब लक्खू ने उसी व्यापारी की फड़ पर एक छोटा सा कोना, सेठ से मांग लिया और थोड़ा-थोड़ा सामान खरीद कर रखने लगा और कपड़े के व्यापार के सभी तौर-तरीके सीखने लगा। कुछ जमा पूंजी और इकट्ठा होने पर लक्यू ने एक तख्त उसी दुकान के फड़ पर रख लिया, लेकिन जल सेवा का अपना कार्य पहले की तरह ही जारी रखा। लक्खू सभी व्यापारियों का प्रिय बन गया। मधुरभाषी और मृदुल व्यवहारी होने के नाते सभी व्यापारियों से उसके अच्छे सम्बन्ध बन गए। व्यापारी समाज में नकद पैसे की हमेशा किल्लत बनी रहती है। अतः कपड़े के कार्य को कम करके लक्खा अपनी जमा पूंजी रोज शाम के वायदे पर देने लगा। सुबह दिया गया रूपया लक्खा को शाम को कुछ लाभ सहित मिलने लगा। अब लक्खू नकदी का सेठ बन गया, जिस व्यापारी को भी रकम की जरूरत होती वो लक्खू से लेने लगा। धीरे-धीरे लक्खू का नकद रूपये के साथ ब्याज की रकम का धंधा चल निकला। अब लक्खू की जगह लखमी चन्द्र सेठ बन गया बाजार में उसने अपनी एक स्थाई गद्दी बना ली। धीरे-धीरे लखमी चन्द्र सेठ का कारोबार बढ़ने लगा। अब लखमीचन्द्र ने अन्य बाजारों में भी अपनी पैंठ बना ली। रूपया अब खूब आने लगा। मारवाड़ी समाज में ही लखमीचन्द्र ने एक बड़ा सा मकान खरीद लिया। उसी समाज में उसने संभ्रांत घर की महिला से विवाह कर लिया। सेठ लख्मीचंद अब घर परिवार वाला हो गया। कपड़ा मार्केट के अलावा अन्य बाजारों में भी उसने ठण्डे पानी के कूलर लगवा दिये। धीरे-धीरे लखमीचन्द्र सोने के गहने व अन्य सामान रहन रखकर रूपया ब्याज पर देने लगा। समय पर पैसा न चुकाने की स्थिति में वह सोना व अन्य प्रोपर्टी लखमीचन्द्र की हो जाती। पैसे में एक बुराई भी है जब मनुष्य को पैसा संग्रह करने के साथ-साथ गिनने भी लग जाता है तब लालच अत्यधिक बढ़ने लगता है। लखमीचन्द्र को लगने लगा कब रुपये की कमी पड़ जाए अतः उसने मजबूत सा बक्सा खरीद कर अपने पास के सोने-जवाहरात भरकर घर में एक उचित स्थान देख कर गाढ़ दिया। वक्त बीता और लखमीचन्द्र का परिवार बढ़ गया। बैंक-बैलेंस तो लखमीचन्द्र का काफी था ही। उसकी जिन्दगी शान-शौकत से बीतने लगी। ऐसा कभी नहीं होता कि सारी जिन्दगी मनुष्य के दिन अच्छे ही रहें।

वक्त बीता और लखमीचन्द्र को टी.बी. की गम्भीर बीमारी ने पकड़ लिया यह वह समय था जब टी.बी. लाइलाज समझी जाती थी परिवार में उसके दो बेटों और पत्नी ने उचित समय समझकर शहर के बाहरी इलाके के सेनेटोरियम में लखमीचन्द्र दाखिल करा दिया। लखमीचन्द्र जिस सेनेटोरियम में दाखिल था उसके पास ही एक मन्दिर था।

उस मन्दिर के लाउडस्पीकर से, मन्दिर में चल रहे श्री मद्भगवतगीता के प्रवचन का कार्यक्रम चल रहा था। उस दिन गीता के पन्द्रहवें अध्याय के सातवें श्लोक की किसी विद्वान द्वारा व्याख्या की जा रही थी।

  1. मृत्यु के समय गीता के दो श्लोक भी जीव के कल्याण में सहायक हो सकते हैं। भगवद गीता अध्याय 15 श्लोक संख्या 117||

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृति स्थानि कर्षति। 7।।

अर्थात् इस देह में यह सनातन जीवात्मा मेरा ही अंश है और वही इन प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षण करता है।।17।।

व्याख्या : इस मनुष्य देह में जीव बना हुआ यह मनुष्य मेरा ही सनातन अंश है। सनातन का तात्पर्य है, जो सदा था, सदा है,और सदा रहेगा। परमात्मा कहते है जैसे मैं सनातन हूँ वैसे ही यह जीव आत्मा भी सनातन है। इसलिए जो धर्म इस सनातन आत्मा का अध्ययन करता है वह भी सनातन धर्म कहलाता है।

इन प्रकृति में स्थित मन के अलावा यह पांचों ज्ञान इन्द्रियों इस प्रकार है क्षोत्र, स्पर्श, दृश्य, स्वाद और घ्राण। यथा : कान, त्वचा, नेत्र, रसना और नासिका और मन।

वही इस प्रकृति में स्थित इनका आकर्षण करता है। जीवात्मा इन मन सहित छः इन्द्रियों को आकर्षित करता है।

जब जीवात्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में जाता है तब पहले शरीर में से मन सहित इन्द्रियों को आकर्षित करके साथ ले जाता है, यही इस जीवात्मा का मन सहित इन्द्रियों को आकर्षित करना है। विषयों को अनुभव करने में मन और पाँचों ज्ञानन्द्रियों की प्रधानता होने से इन छहों को आकर्षित करना बतलाया गया है। यहाँ ‘मन’ शब्द अन्तःकरण का वाचक है, अतः बुद्धि एवं अहंकार उसी में आ जाता है।और जीवात्मा जब मन सहित इन्द्रियों को आकर्षित करता है, तब प्राणों के द्वारा ही आकर्षित करता है। अतः पाँच कर्मेन्द्रियाँ (वाणी, हाथ, पैर मुत्रेन्द्रिय अर्थात् उपस्थ और गुदा) और पोच प्राण (प्राण, अपान, उदान, व्यान और समान) को भी इन्हीं के साथ समझ लेना चाहिए।
सम्बन्ध : यह जीव आत्मा मन सहित छः इन्द्रियों को किस समय कित्त प्रकार और किसलिए आकर्षित करता है, इस सम्बन्ध में अगला श्लोक: भगवद गीता अध्याय 15 श्लोक संख्या आठ

वायु गन्ध के स्थान से गन्ध को ग्रहण करके ले जाता है, वैसे देहादि का स्वामी जीव आत्मा जिस शरीर का त्याग करता है, उससे इस मन सहित इन्द्रियों को ग्रहण करके फिर जिस शरीर को प्राप्त होता है उसमें जाता है। I8 ।

व्याख्या : स्थूल शरीर इत्र से भरा हुआ रूई का फोहे के समान है। इसमें सत्तरह तत्वों वाला कारण और सूक्ष्म शरीर इत्र की सुगन्ध की तरह मौजूद है। मृत्यु के समय बहती हुई हवा (अर्थात् आत्मा) उस सूक्ष्म शरीर को अपने साथ ले जाएगी और उसके कर्मानुसार उस गर्भ में स्थापित कर देगी जो उसे मिलने वाला है और खाली रूई के लोहे की तरह स्थूल शरीर रह जाएगा जिसे या तो अग्नि को समर्पित कर दिया जाएगा या जमीन में दफना दिया जाएगा।

  1. जीवन के अन्त में उत्पन्न अपराध बोध कल्याणकारक होता है
    यह सत्य है कि तृष्णा के कीचड़ में फंसा हुआ मनुष्य तभी चेतता है जब उसे दुख का सामना करना पड़ता है। दुःख से उत्पन्न वैराग्य मनुष्य को अध्यात्म की तरफ आकर्षित करता है। अध्यात्म से उत्पन्न ज्ञान का शुद्ध जल तृष्णा के कीचड़ से मैला हुआ मनुष्य का अंतःकरण साफ करने का काम करता है। टी.बी. से मरणासन्न स्थिति में पहुँचा लखमीचन्द्र पश्चाताप की अग्नि से जलने लगा। धन संग्रह करने की कामना में उसने कभी ध्यान ही नहीं दिया कि जो जरूरतमंद अपने जवाहरात और गहने उसके पास जमा कर जाते थे और फिर वापस छोड़ा नहीं पाते थे वे सभी जरूरतमंद मजबूरी के कारण ऐसा करते थे। उसने जो धन संग्रह किया वो मजबूर मनुष्यों का धन था जिसे उसने हड़प लिया। पश्चाताप मनुष्य के मन का मैल धो देता है। लखमीचन्द्र के बहते आँसू यही काम कर रहे थे। उसने हाथ जोड़ कर मन ही मन प्रार्थना की प्रभु उसे एक मौका मिल जाए तो उन सब मजबूर मनुष्यों के गहने वापिस लौटा दे। लेकिन लखमीचन्द्र को मिले शरीर का समय समाप्त हो चुका था।

यहाँ एक जानने योग्य प्रश्न सभी जिज्ञासु के मन में पैदा होता होगा कि पुनर्जन्म में जीवात्मा को एक शरीर को छोड़ कर दूसरे स्थूल शरीर की प्राप्ति आसानी से हो जाती या उसमें कुछ कष्ट भी होता है। इस जिज्ञासा हेतु विभिन्न विद्वानों और इस विषय पर उस काल की परिस्थिति के बारे में विभिन्न शास्त्रों के बारे में वर्णित ज्ञान इस प्रकार है।

विभिन्न जानकारों का मत है कि मृत्यु के समय जीव को हजार बिच्छुओं के काटने के समान का कष्ट होता है। पतंजलि योग शास्त्र के षड्दर्शन समन्वय के न्याय-दर्शन के अनुसार इसको प्रेतभाव के नाम से जाना जाता है और पार्थिव शरीर के अन्तिम संस्कार को प्रेतक्रिया के नाम से जाना जाता है।

एक अन्य महापुरुष जिन्होंने गीता पर साधक संजीवनी नामक ग्रन्थ लिखा है, का मत है कि जो मनुष्य अन्तकाल के समय पर स्वयं ईश्वर से प्रार्थना करता हुआ अपनी स्वेच्छा से शरीर त्यागने का संकल्प करता है उसको कोई कष्ट नहीं होता किन्तु जो मरना नहीं चाहता उसको भयानक कष्ट का सामना करना पड़ता है क्योंकि मरना चाहता नहीं और चूँकि उसकी आयु, जो परमात्मा ने उसे बख्शी थी उसका समय खत्म हो चुका अतः उससे स्थूल देह छुड़वाई जाती है। इस विषय पर अर्जुन का एक प्रश्न भगवान कृष्ण से पूछा गया था उसका वर्णन अध्याय छः श्लोक संख्या 37 में है।
अर्जुन बोले – हे श्री कृष्ण! जो योग में श्रद्धा रखने वाला है, किन्तु संयमी नहीं है,इस कारण जिसका मन अन्तकाल में योग से विचलित हो गया है, ऐसा साधक योग की सिद्धि को अर्थात् भगवत साक्षात्कार को न प्राप्त होकर किस गति को प्राप्त होता है। 37 ।।

हे महाबाहो! क्या वह भगवत्प्राप्ति के मार्ग में मोहित और आश्रयरहित पुरुष छिन्न-भिन्न बादल की भांति दोनों ओर से भ्रष्ट होकर नष्ट तो नहीं हो जाता?। ।38।। हे श्रीकृष्ण! मेरे इस संशय को सम्पूर्ण रूप से छेदन करने के लिए आप ही योग्य हैं, क्योंकि आपके सिवा दूसरा इस संशय का छेदन करने वाला मिलना सम्भव
नहीं।।39।।

व्याख्या : इस श्लोक की व्याख्या करते हुए श्री जयदयाल गोयन्दका जी लिखते हैं कि अर्जुन यहाँ मृत्यु के बाद की गति जानना चाहते हैं यह एक ऐसा रहस्य है, जिसको बुद्धि और तर्क के बल पर कोई नहीं जान सकता। इसको सर्वत्र विचरण करने की सामर्थ्य रखने वाले देवता और ऋषि- मुनि भी किसी अंश तक जान सकते हैं । (पाठको सभी शास्त्रों में माना गया है कि यह मन ही मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष कारण है और इसके सम्बन्ध में जो-जो साधन मनुष्य को करने चाहिए उनके बारे में इस लेख में बाद में साधना के द्वारा जो कुछ लिखा जाए उसको ध्यान से समझ कर उसके अनुसार व्यवहार करके इस जीवन का परम लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास किया जाए।)

To be continued…

( the above extract is from the book “काम और राम” written by “Devraj Pathania” )

Rebirth

An interesting story of rebirth is following from the book Kama & Ram’ based on Karm Vidhan of ‘Gita-Gyaan ‘.

कर्म विधान : कर्म विधान के अनुसार संसार के सभी मनुष्य कर्म विधान के अन्तर्गत ही

हैं। कर्म का विभाजन मोटे तौर पर तीन प्रकार से है :

संचित कर्म, प्रारब्ध कर्म, क्रियामाण कर्म

जो कर्म हम वर्तमान समय में कर रहे हैं इसको क्रियामाण कर्म कहेंगे जो विधाता द्वारा नोट किए जा रहे हैं।

जो परिस्थितियों हमारे सम्मुख सुख-दुख बनकर आ रही हैं वह प्रारब्ध कर्म कहलाते हैं। इनको भुगत कर हम पिछले कर्मों का हिसाब पूरा कर रहे हैं । तीसरे प्रकार के संचित कर्म हैं, ये वे कर्म हैं जो अभी संचित हैं और जो प्रारब्ध

कर्म बन कर भविष्य में हमारे सम्मुख आयेंगे। कर्मविधान का सारांश यह है कि हर कर्म का फल होता है। हमारे द्वारा जो भी कर्म होता है उसका फल हमारा पीछा करता है जब तक हम स्वयं भोग कर समाप्त नहीं करेंगे।

क्या इस कर्म-बन्धन से छूटने का उपाय भी है? श्रीकृष्ण ने इसके बारे में बताया कि जो भी कर्म बिना फल की कामना के किया जाता है, इस प्रकार का कर्म फल-भोग उत्पन्न नहीं करता। इसी प्रकार के कर्म को ‘निष्काम कर्म’ कहा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण का उपदेश है कि ऐ मनुष्यों, कर्म करो लेकिन फल की कामना न करो। कहने का तात्पर्य यह है कि ‘कामना’ अथवा काम दुख का कारण बनता है।

9. कथा के द्वारा पुनर्जन्म को समझना

पाठकों आप इन कथाओं को ध्यानपूर्वक पढ़ें इन सबका सम्मान हमारे विषय “काम और राम” को जानने और समझने में सहायता करेंगे (राजस्थान) पाली मारवाड़ के सूखे में रहने वाले एक कुम्हार के घर जन्मे एक बालक की कथा है। कुम्हारों का कार्य होता है मिट्टी से नाना प्रकार के बर्तन, खिलौने इत्यादि बनाना। ज्यादातर गर्मी ऋतु में इनके द्वारा पानी रखने के घड़े बनाना, जो कि सीजन में ही ज्यादातर चलता है। घर में बूढ़े माता-पिता और एक मिट्टी की कच्ची ईटों से बना घर। गरीबी का माहौल इस बालक को कष्ट देता ही रहता था।

एक बार उसके करे में कुछ महात्मा पधारे जिन्होंने एक सप्ताह तक गीता प्रवचन का कार्यक्रम रखा। इस बालक ने इस कार्यक्रम में तन-मन से साथ दिया। इन सन्तों की जी-जान से सेवा करना और उनके प्रवचन को ध्यान से सुनना जारी रखा। प्रवचन के दौरान कर्म विधान की विस्तृत चर्चा की गई और इस विचार को प्रस्तुत किया कि पहले कर्म अनुसार मनुष्य का प्रारब्ध बनता है फिर उसको जन्म मिलता है जो भी मनुष्य भोगता है वो उसी के कर्मों का फल होता है।” आत्मा अमर है, शरीर नश्वर है। पंचतत्वों से बना हुआ यह स्थूल शरीर एक प्रकार से आत्मा के वस्त्र है, जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर नये वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार ये आत्मा रथूल शरीर के पुराने होने पर उसे त्याग कर नया स्थूल शरीर धारण करती रहती है।” (श्रीमद् भगवत गीता अध्याय दो श्लोक संख्या 22)

श्रीमद्भागवत गीता अध्याय दो श्लोक संख्या । लड़के के इस जीवन का नाम रामू है। रामू महात्माओं के प्रवचन ध्यान से सुन रहा था। प्रवचन में आगे इस तथ्य को भी उजागर किया गया कि ये कोई आवश्यक नहीं है कि मनुष्य को हर जीवन में मनुष्य शरीर ही मिले। मनुष्य जीवन तो अत्यन्त दुर्लभ है और यह उसको परमात्मा की कृपा से ही मिलता है और मिलता भी इसलिए है कि इस जीवन को प्राप्त कर मनुष्य साधन करके परमात्मा का परमधाम प्राप्त कर ले ताकि फिर उसे इस संसार रूपी बीहड़ वन में धक्के न खाने पड़ें। इसे ऐसा भी मान सकते हैं कि यह भवसागर है जिसमें मनुष्य को शरीर रूपी जहाज मिल गया है जिस पर सवार होकर इस भयंकर संसार सागर से पार हो जाए।

गीता प्रवचन का कार्यक्रम समाप्ति पर था और रामू के मन में एक विचार तूफान की तरह चल पड़ा। मैं जो इस जीवन में इतने कष्ट भोग रहा हूँ, घोर दरिद्रता का जीवन, मुझे किन पाप कर्मों के परिणाम के रूप में मिला है। मैं इस गुत्थी को कैसे सुलझाऊँ, कैसे जाने कि मैंने पिछले जन्मों में कौन-से कुकर्म किए थे। बहुत सोचने के बाद अपने इस प्रश्न को लेकर एक दिन रामू उन संतों के सम्मुख उपस्थित हुआ। संत राम की सेवा से अत्यन्त प्रसन्न थे, लेकिन इस जिज्ञासा ने उनको उलझन में डाल दिया कि इसके प्रश्न को कैसे सुलझाएं।………

to be continued tomorrow on same platform……..

श्मशान वैराग्य

हिन्दू धर्मावलम्बियों में एक परम्परा है कि मृत व्यक्ति को अन्तिम संस्कार के लिए ले जाने के लिए ज्यों ही अर्थी को उठाया जाता है त्यों ही उपस्थित जन समुदाय संवेद स्वर में कह उठता है राम नाम सत्य है, राम-नाम सत्य है। श्मशान भूमि तक यही प्रक्रिया जारी रहती है। दाह-संस्कार से लौटते समय कोई नहीं कहता कि

राम-नाम सत्य है तो क्या श्मशान-भूमि से लौटते समय राम-नाम असत्य हो जाता है? कुछ लोग कहेंगे कि यह तो अपशकुन है, ऐसा क्यों? प्रत्येक मनुष्य इस राम नाम का महत्व अगर जीवन रहते जान जाए. और इसको ध्यानस्थ होकर या उठते-बैठते अथवा कोई भी कार्य करते समय अपने हृदय में स्थित उस परमात्मा का स्मरण कर ले तो उसका मनुष्य जीवन सफल हो सकता है किन्तु ऐसा नहीं है, इसका कारण यह है कि श्मशान जाते समय मनुष्य में जो वैराग्य की भावना जागती है वही लौटते समय कम होती चली जाती है। इसी को श्मशान-वैराग्य कहते हैं अर्थात् जो अल्पकालिक होता है। ज्यादातर प्रत्येक व्यक्ति अपने मन में यही भाव रखता है, मेरी ऐसी गति अभी दूर है। यद्यपि भविष्य कोई नहीं जानता। ईश्वर-प्रदत्त मनुष्य को दी हुई साँसों की पूँजी हर पल के गुजरने के साथ ही समाप्त होती जा रही है किन्तु प्रभु की माया में फंसा जीव चेतता ही नहीं। वैराग्य ही वह तत्त्व है जो इस संसार में फंसे जीव को सावधान करता है किन्तु कुछ पल के बाद ही यह श्मशान-वैराग्य समाप्त हो जाता है और मनुष्य फिर माया-आधीन प्राणी जैसा आचरण जारी रखता है। एक उदाहरण लेते हैं। रामायण का किष्किन्धा-काण्ड श्री राम और सुग्रीव की मित्रता हुई। तय हुआ कि श्री राम, सुग्रीव को उसके बड़े भाई बालि के त्रास से मुक्ति दिलायेंगे, और सुग्रीव अपने वानर-दल सहित माता सीता की खोज और रावण-वध में सहायता करेंगे।

नारायण अवतार श्रीराम, एक ही बाण से बालि को मरणासन्न स्थिति में पहुँचा देते हैं। इसी अवसर पर सुग्रीव, बालि-पुत्र अंगद और बालि की बुद्धिमती पत्नी तारा जो वहाँ उपस्थित हैं, विलाप करने लगते हैं मृत्यु की वेला में अपने बल से के नशे में चूर बाली को अपने किए हुए पर पश्चाताप होता है और सुग्रीव जिसने श्री राम से प्रार्थना करके बालि को मृत्यु मुख में पहुँचाया था. अचानक उपजे भातृ-प्रेम से रूदन करने लगते हैं। अंगद अपने पिता की इस स्थिति से दुखी है और देवी तारा श्री राम से अपने पति की भांति मृत्यु प्रदान करने की भावना करने लगती है। श्री राम तारा-देवी को दिलासा देते हुए समझाते है कि प्रत्येक जीव इस संसार में अकेले ही आता है और अकेले ही जाता है। श्मशान-वैराग्य के कारण आप मृत्यु की कामना करने लगी हैं।

दृश्य फिर बदलता है। सुग्रीव को बड़े भाई का राज्य प्राप्त हो जाता है जिसे पाकर वह भोग-विलास में डूब जाता है। कारण श्मशान-वैराग्य तिरोहित हो जाता है। यहाँ तक कि उसे चेताने के लिए श्री राम को अपने छोटे भाई लक्ष्मण को भेजना पड़ता है। यह उदाहरण बताता है कि श्मशान-वैराग्य अल्पकाल का होता है। किन्तु यही वैराग्य अभ्यास के साथ हो तो मोक्ष का कारण बनता है।

The above extract is from book “काम और राम” written by “Devraj Pathania”

काम और राम

अब जानिए एक महत्वपूर्ण तथ्य –

मनुष्य जीवन के लिए सबसे मूल्यवान क्या है? उत्तर 8 एवार । जय त श्वास चलेंगे तभी तक आपका जीवन है। परमात्म-आराधना के लिए इसी श्वास का आधार बना दीजिए। परमात्मा का जो भी नाम आपको अच्छा लगे वही याद कीजिए जैसेः राम, कृष्ण, शिव, वाहे-गुरू. अल्लाह. खदा, जीसस अर्थात जिस भी ध्ग के आप मानने वाले हैं, उसी नाम को बार-बार दोहरायें। नाम छोटा होगा तो जपने में आसानी होगी। श्वास अन्दर ली, तो राम-राम श्वास चाहर छोडी तो, राग–राम इसी क्रम का बार-बार दोहरायें। इस क्रिया को ही नाम-स्मरण कहा जाता है।

संसार के सभी धर्मावलंबी इसी विधि को अपनाने की सलाह देते हैं। कई साधक इसके लिए माला का भी उपयोग करते हैं। हाथ में माला लेकर मनकों को घुमाते जाना और प्रत्येक मनके के साथ ईश्वर का नाम स्मरण करना। यह भी एक कामयाब विधि है और इसका उपयोग भी ठीक है, किन्तु मानसिक जप सबसे उत्तम है। श्वास के साथ जप करना प्राण-जप कहलाता है। जो करता है ईश्वर प्रदत्त शान्ति प्राप्त करता है। इसके लिए सबसे पहली योग्यता है श्रद्धा की। सिर्फ श्रद्धावान साधक ही इस विधि को अपना सकता है। जिसमें श्रद्धा नहीं है वो तो इधर देखेगा भी नहीं। जिसकी परमपिता परमात्मा को जानने की जिज्ञासा है, वही विद्वानों के पास जाकर प्रश्न करेगा और उनकी कृपा द्वारा दिये गए ज्ञान के मुताबिक प्रश्न करेगा और जानेगा। किसी महापुरुष के न मिलने पर शास्त्रों के अध्ययन द्वारा जानने का प्रयास करेगा इसी सम्बन्ध में गीता के चौथे अध्याय का 39 वॉ श्लोक इस प्रकार से है :

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रिय। ज्ञान लब्धवा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।

4/39

हिन्दी व्याख्या : जो जितेन्द्रिय तथा साधन परायण है, ऐसा श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है, और ज्ञान को प्राप्त होकर वह तत्काल परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है।

इस श्लोक में श्रद्धावान मनुष्य को ज्ञान प्राप्त होने की बात आई है। अपने में श्रद्धा कम होने पर भी मनुष्य भूल से अपने को अधिक श्रद्धावाला मान सकता है. इसलिए भगवान ने श्रद्धा की पहचान के लिए दो विशेषण दिए हैं संयेतन्द्रिय और तत्पर। जिसकी इन्द्रियाँ पूर्णतया वश में हैं, वह संयतेन्द्रिय है और जो अपने साधन में तत्परतापूर्वक लगा हुआ है, वह तत्पर है। अगर इन्द्रियाँ संयत नहीं हैं और विषयभोगों की तरफ जाती हैं तो साधन-परायणता में कमी समझनी चाहिए। श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम’ परमात्मा, महापुरुषों में, धर्म और शास्त्रों में प्रत्यक्ष की तरह आदरपूर्वक विश्वास होना

‘श्रद्धा’ कहलाती है।

जब तक परमात्मतत्त्व का अनुभव न हो, तब तक परमात्मा में प्रत्यक्ष से भी बढ़कर विश्वास होना चाहिए। वास्तव में परमात्मा से देश-काल आदि की दूरी नहीं है, केवल मानी हुई दूरी है। दूरी मानने के कारण ही परमात्मा सर्वत्र विद्यमान रहते हुए भी अनुभव में नहीं आ रहे हैं। इसलिए ‘परमात्मा अपने में है। ऐसा मान लेने का नाम ही श्रद्धा है।

To be continued from the book “काम और राम” written by “Mr. Devraj Pathania”

काम और राम

अब इस विषय का सारांश, श्लोक 6/47 के अनुसार दिया जा रहा है :

जो साधक अत्यन्त श्रद्धा और प्रेम से एकान्त साधना करता है और निरन्तर उठते-बैठते, खाते-पीते, सोते-जागते अपना मन अपने साध्य अर्थात् परमात्मा में लगाये रखता है, जो परमात्मा से न कोई अपेक्षा रखता है, न कोई कामनापूर्ति चाहता है। उसका प्रेम विशुद्ध और श्रद्धा सहित होता है, अपने कल्याण के लिए वो उसी प्रकार परमात्मा से प्रेम करता है जैसे छोटा मासूम शिशु, सिर्फ अपनी माँ के ही परायण है।

ऐसा विशुद्ध प्रेम पल-पल बढ़ता ही जाता है। भक्त के रोम-रोम से एक ही पुकार उठती है। हे मेरे सर्वस्व, तू ही मेरा एकमात्र सहारा। मनुष्य देह प्राप्त करके मनुष्य के लिए कल्याण का तत्त्व एक ही है कि जितना

जल्दी हो सके वह अपने परम लक्ष्य अर्थात् परमात्मा को प्राप्त कर ले।

“बहुत जन्मों के अन्त के जन्म में तत्त्वज्ञान को प्राप्त जीव, सब कुछ वासुदेव ही हैं – इस प्रकार मुझ को भजता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।” – गीता 7/19 वह मनुष्य मुक्त कहलाता है क्योंकि ऐसे मनुष्य का किसी भी काल में इस मायामय संसार से पुनः सम्बन्ध नहीं होता। इस अवस्था में उसका पुनरागमन क्योंकर हो सकता है?

हजारों मनुष्यों में कोई मनुष्य मोक्ष के लिए प्रयत्न करता है और यत्न करने वाले योगियों में से कोई मनुष्य ही मुझको (परमात्मा को) तत्त्व से जानता है। 7/3 गीता

किसी भी शास्त्र में यह नहीं कहा गया है कि काम-क्रोधादि विकारों के रहते

जीवन्मुक्ति प्राप्त हो सकती है। इसीलिए गीता में काम, क्रोध और लोभ को नरक का

द्वार बताया गया है। गीता 16/21

भगवान ने समस्त पापों का बीज काम को ही बताया है क्योंकि कामना की पूर्ति अगर हो जाती है तो लोभ पैदा होगा और कामना की पूर्ति नहीं होती है तो क्रोध पैदा होगा। आत्मज्ञान की प्राप्ति में यह काम ही बाधक बनता है फिर भी अधिकतर काम क्रोध आदि विकारों का समूल नाश करने का प्रयत्न नहीं करते। पक्षपात का विचार त्याग करके विचार किया जाए तो यही ज्ञात होता है कि काम क्रोध परायण मनुष्यों की अपेक्षा काम-क्रोध रहित जीवन्मुक्त मनुष्य अधिक सम्माननीय होगा।

जीवन मुक्त मनुष्य का प्रसंग जरूर व्यक्त किया, किन्तु मनुष्य जीवन को मुक्ति तक ले जाना अत्यन्त कठिन है। इस योग्यता को प्राप्त करने के लिए अत्यन्त कठिन परीक्षा पास करनी होती है। संयमित जीवन जीते हुए ईश्वर आराधना का मार्ग अपनाना होता है। उसके लिए साधना का मार्ग अपनाये बिना काम नहीं चलता। यहीं हमें अपने हृदय में स्थित परमात्मा को ढूंढना है, जो हमें नित्य प्राप्त है किन्तु हम उसे भुलाये बैठे हैं। ईश्वर के प्रति प्रेम जब तक हमारे मन में नहीं उमड़ता, तब तक हमें पता नहीं चलता कि जिसे हम नित्य अपने साथ लिये घूम रहे हैं उसी को प्रेमा-भक्ति द्वारा प्राप्त करना होता है। काम को त्यागे बिना राम को प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है।

ज्ञान, कर्म मार्ग भी आवश्यक है किन्तु इन दोनों मार्गों में भक्ति बिना आगे नहीं बढ़ा जाता। भक्ति ही एक ऐसा सरल और सुगम साधन है जिसे अल्पज्ञ भी आसानी से अपना सकता है।

To be continued from the book ” काम और राम ” written by “Dev Raj Pathania”

Create your website at WordPress.com
Get started